BHRAMAR KA JHAROKHA DARD E DIL WELCOMES YOU

Sunday, 14 August 2011

प्यार से कीमती कोई दौलत नहीं


मेरे सपनो की तस्वीर खाली पड़ी

रंग भर दोगे मुझको ये अनुमान दो

मंदिरों में भटकता नहीं मूर्ति बोली

प्राण बन जाओगे कोई आभास दो

मेरे सपनो की तस्वीर.......

जंगलों में भटकता रहा रात दिन

ये भी वीरान से -तुम कहाँ -ख्वाब दो

पर्वतों पे चढ़ा पाँव घायल किया

रक्त रिश्ता है उर से -उपचार दो !!

ढूंढता मै फिर हर नगर गाँव घर

हो जो परदे में भी चाँद को न ढको

कितना सुन्दर लगे -तोता मैना उड़े

कैद खुद को जकड दुःख सभी को न दो

मेरे सपनो की तस्वीर...

प्यार से कीमती कोई दौलत नहीं

भाया कोई जो मन गुफ्तगू तो करो

दीप मै हूँ जलूँगा सदा ही सनम

रोज देखो मगर ना बुझाया करो

मेरे सपनो की तस्वीर खाली पड़ी

रंग भर दोगे मुझको ये अनुमान दो

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर५

14.08.2011 jal pee bee

DE AISA AASHISH MUJHE MAA AANKHON KA TARA BAN JAOON

Saturday, 13 August 2011

तेरी रक्षा का प्रण बहना रग-रग में राखी दौडाई


बहना मेरी दूर पड़ा मै

दिल के तू है पास

अभी बोल देगी तू "भैया"

सदा लगी है आस

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मुन्नी -गुडिया प्यारी मेरी

तू है मेरा खिलौना

मै मुन्ना-पप्पू-बबलू हूँ

बिन तेरे मेरा क्या होना !

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तू ही मेरी सखी सहेली

कितना खेल खिलाया

कभी -कभी मेरी नाक पकड़ के

तूने बहुत चिढाया !

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थाली में तू अपना हिस्सा

चोरी से था डाल खिलाया

जान से प्यारी मेरी बहना

भैया का गहना है बहना !!

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जब एकाकी मै होता हूँ

सजी थाल तेरी वो दिखती

चन्दन जभी लगाती थी तू

पूजा- मेरी आरती- करती !

रक्षा -बंधन और मिठाई

दस-दस पकवान पकाती थी

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बाँध दिया बंधन से तूने

ये अटूट रक्षा जो करता

मेरी बहना सदा निडर हो

ख़ुशी रहे दिल हर पल कहता

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जहाँ रहे तू जिस बगिया में

हरी-भरी हो फूल खिले हों

ऐसे ही ये प्यारा बंधन

सब मन में हो -गले लगे हों

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तू गंगा गोदावरी सीता

तू पवित्र मेरी पावन गीता

तेरी राखी आई पाया

चूम इसे मै गले लगाया

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कितने दृश्य उभर आये रे

आँख बंद कर हूँ मै बैठा

जैसे तू है बांधे राखी

मन -सपने-उड़ता मै "पाखी"

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तेरी रक्षा का प्रण बहना

रग-रग में राखी दौडाई

और नहीं लिख पाऊँ बहना

आँख छलक मेरी भर आई

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सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५

१३.०८.११ ८.४५ पूर्वाह्न

जल पी बी




दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं


DE AISA AASHISH MUJHE MAA AANKHON KA TARA BAN JAOON

Monday, 8 August 2011

भीष्म -शैय्या पर पड़े


भीष्म -शैय्या पर पड़े
आज आप “भीष्म ” शैय्या पर पड़े
इतने दिन सब कुछ सहे
आराम से खून देते जा रहे हैं

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दीजिये -ख़ुशी है












लेकिन हम मच्छर नहीं

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की केवल अपना पेट भर के
आप को छोड़ देंगे
हमारी तो पूरी जमात है




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घर है परिवार है

और जब आप चेतना शून्य हो जायेंगे

तो हम सब आप के चाहने वालों को

घर परिवार को
आप की जमात को
एक -एक कर
बुला लेंगे
सुला देंगे
इसी शैय्या पर
खून देते रहने के लिए

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(सभी फोटो साभार गूगल/नेट से लिया गया )

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
२८.७.२०११ जल पी बी
४.२९ पूर्वाह्न

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Saturday, 6 August 2011

ये “भैंसा” - गैंडा सा मोटा चमड़ा लिए


भीड़ इकट्ठी होती है
शोर मचाती है
ढोल पीटती है
लेकिन उसकी लाल आँखें
बड़ी सींग
अपार शक्ति देख
कोई पास नहीं फटकता
कभी कुछ शांत निडर
खड़ा हो देखता
कान उटेर सब सुनता रहता
कभी कुछ दूर भाग भी जाता

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लेकिन ये “भैंसा”
गैंडा सा मोटा चमड़ा लिए
जिस पर की लाठी -डंडे -
तक का असर नहीं
खाता जा रहा
खलिहान चरता जा रहा
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अब तो ये अकेला नहीं
“झुण्ड ” बना टिड्डी सा
यहाँ -वहां टूट पड़ता !!

( सभी फोटो गूगल/ नेट से साभार लिया गया )

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल “भ्रमर ”
5.04 पूर्वाह्न जल पी बी
०६.०८.२०११



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Thursday, 4 August 2011

आई बरखा बहार –घर आ जा बलमू


आई बरखा बहार –घर आ जा बलमू
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आई बरखा बहार
रिमझिम पड़े ला फुहार
जियरा उमडि–उमडि तरसाए
घर आ जा बलमू !!
—————————–

नीम के डारी झूला पड़ गए
तन मन सब गदराया
धानी चुनरिया – पेंग लड़ाकर
उडि मन- ज्वालामुखी बनाया

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हरियाली -संग फूल खिले- पर
पीला पड़ता गात हमारा
मूक नैन हों इत- उत भटकें
रिमझिम सावन मन ना भाता
जल्दी बरसे घहर-गरज कर
जियरा जरा जुडा जा
घर आ जा बलमू …..
—————————–
सखी सहेली राधा-कृष्णा
रास -रंग सब मन भरमाये !
पावस ऋतू नित बरस -बरस के
अग्नि काम भड़काए !
भीग-भीग इत उत घूमूं मै
नैन नीर हिय जेठ दुपहरी
बेबस पपीहा पीऊ -पुकारे !
सेजिया नींद न आये !
घर आ जा बलमू ————–
———————–
नागपंचमी पे आ जाना
गुडिया -गुड्डा –मेला- सर -का
जी भर लुत्फ़ उठाना
कजरी -मल्हार-वो मटर का दाना
मार-मार -वो सजा सजाया लाठी डंडा
कुश्ती- दंगल -हंसी ठिठोली

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रंग रंगोली -झूले पर हे पेंग लगाये
पेंच लड़ाए -ज्यों पतंग सा
बदली तक मुझको पहुँचाना
इतने ऊपर !
इन्द्रधनुष से रंग बदल मै
शीतल हो जब बरस पडूँ
बूँद बूँद मोती बन जाये
हीरे सी मै चमक पडूँ
लिए बांसुरी- मीत – मल्हार
कजरी –गा- मै -कमल खिलूँ
तुम भौंरे हे ! बंद कली में
रात यहीं सो जाना
घर आ जा बलमू ……

( सभी फोटो साभार गूगल/नेट से लिया गया )

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल “भ्रमर ”
4.08.2011, ५.३५ पूर्वाह्न जल पी बी


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