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BHRAMAR KA JHAROKHA DARD E DIL WELCOMES YOU
Saturday, 2 April 2022
संगिनी हूं संग चलूंगी
प्रतापगढ़ साहित्य प्रेमी मंच -BHRAMAR KA DARD AUR DARPAN: संगिनी हूं संग चलूंगी: BHRAMAR KA JHAROKHA-DARD-E-DIL: संगिनी हूं संग चलूंगी : संगिनी हूं संग चलूंगी ------------------------ जब सींचोगे पलूं बढूंगी खुश हूंगी मै त...
Sunday, 3 October 2021
विश्व प्रकृति दिवस आओ पेड़ लगाएं
मेरे प्यारे मित्रों आज विश्व प्रकृति दिवस है, प्रकृति है तो हम हैं , प्रकृति की गोद में ही हम फलते फूलते हैं जीते हैं खेलते हैं सीखते हैं विकास करते हैं इस लिए अपनी मां जननी सरीखी इस प्रकृति के लिए सदा हम कुछ करते रहें हरे भरे पेड़ पौधे फूल घाटियां पर्वत झरने चिड़िया जानवर तरह तरह के जीव और प्यारे बच्चे किस का मन नहीं मोह लेते लेकिन जब हम अपने को बहुत ज्ञानी ध्यानी मान प्रकृति और पर्यावरण को दरकिनार कर स्वार्थ वश विध्वंशक चीजों को अपना कर केवल धन कमाने में लगे रहते हैं और प्रकृति की उपेक्षा करते हैं पेड़ पौधे काट डालते हैं तालाब को पाट रहे नदियों को समेट कर वहां घर बना रहे पर्वतों के आधार को अनायास हर तरफ काटे जा रहे तो विभीषिका भी हमारे सामने आती है और हम इंसान इतने ताकतवर हो भी प्रकृति की मार के आगे एक पल नही ठहरते आइए पेड़ लगाएं , सब को तो अपने पास ये अवसर नहीं होगा तो जहां भी अवसर मिले पार्क स्कूल सड़क आदि के पास ही सही , पेड़ लगाएं लगवाएं और यथा संभव उसे बड़े होने तक देख रेख में भी सहयोग देते रहें ।
फिर देखिए अपनी प्रकृति का प्रेम ।
शुभ प्रभात प्रभु कृपा सब पर बनी रहे।
सुरेंद्र कुमार शुक्ल भ्रमर 5
प्रतापगढ़
उत्तर प्रदेश , भारत।
Tuesday, 20 April 2021
संगिनी हूं संग चलूंगी
संगिनी हूं संग चलूंगी
------------------------
जब सींचोगे
पलूं बढूंगी
खुश हूंगी मै
तभी खिलूंगी
बांटूंगी
अधरों मुस्कान
मै तेरी पहचान बनकर
********
वेदनाएं भी
हरुंगी
जीत निश्चित
मै करूंगी
कीर्ति पताका
मै फहरूंगी
मै तेरी पहचान बनकर
*********
अभिलाषाएं
पूर्ण होंगी
राह कंटक
मै चलूंगी
पाप पापी
भी दलूंगी
संगिनी हूं
संग चलूंगी
मै तेरी पहचान बनकर
*********
ज्योति देने को
जलूंगी
शान्ति हूं मैं
सुख भी दूंगी
मै जिऊंगी
औ मरूंगी
पूर्ण तुझको
मै करूंगी
सृष्टि सी
रचती रहूंगी
सर्वदा ही
मै तेरी पहचान बनकर
**********
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर5
प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश ,
भारत
Monday, 9 March 2020
नफरत की ज्वाला में,
घी का हवन देते,
कुछ लोग,
तस्वीरें बनाते,
आविष्कार करते,
आपस में उलझे हैं,
आग उसने लगाई,
इस ने लगाई,
खुद जली,
बतिया रहे,
बची हुई सांसों को,
सुलगते अंगारों से,
जहरीले धुएं में,
हवा देते,
घुट घुट के जीते हुए,
छोड़ कहीं जा रहे,
घी का हवन देते,
कुछ लोग,
तस्वीरें बनाते,
आविष्कार करते,
आपस में उलझे हैं,
आग उसने लगाई,
इस ने लगाई,
खुद जली,
बतिया रहे,
बची हुई सांसों को,
सुलगते अंगारों से,
जहरीले धुएं में,
हवा देते,
घुट घुट के जीते हुए,
छोड़ कहीं जा रहे,
हरी भरी तस्वीरें
काली विकराल हुई
मूरत की सूरत में
आंखें बस लाल हुईं
काली विकराल हुई
मूरत की सूरत में
आंखें बस लाल हुईं
काश कुछ बौछारें,
शीतलता की आएं,
दहकती इन लपटों की
अग्नि बुझाएं,
धुंध धुएं को हटाएं,
पथराई आंखों में आंसू तो आएं
स्नेह की , दया की ,
भूख की प्यास की ,
जीवन के चाह की,
चमक तो जगाएं
सुरेंद्र कुमार शुक्ल 'भ्रमर' 5
शीतलता की आएं,
दहकती इन लपटों की
अग्नि बुझाएं,
धुंध धुएं को हटाएं,
पथराई आंखों में आंसू तो आएं
स्नेह की , दया की ,
भूख की प्यास की ,
जीवन के चाह की,
चमक तो जगाएं
सुरेंद्र कुमार शुक्ल 'भ्रमर' 5
DE AISA AASHISH MUJHE MAA AANKHON KA TARA BAN JAOON
Saturday, 12 April 2014
आम' आदमी बन जाऊं
आम' आदमी बन जाऊं
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मन खौले 'शक्ति' की
खातिर
'आम' आदमी बन जाऊं
भीड़ हमारे साथ चले
तो
रुतबा मै भी कुछ पाऊँ
अगर 'सुरक्षा' चार
लगे तो
शायद 'थप्पड़' ना खाऊं
अंकुर उभरा दबा -दबा
मै
टेढ़ा -मेढ़ा ऊपर आया
ऊपर हवा स्वर्ग सी
सुन्दर
मान के सीढ़ी चढ़ आया
'सिर ' ऊपर तलवार है लटकी
आज समझ मै ये पाया
कहाँ रहूँ नीचे है
दल-दल
ऊपर बिजली गिरती गाज
मूंड मुंडाए गिरते
ओले
जान बचाऊं करून क्या
काज ?
डाकू 'वो' लूटें सब
अच्छा
निजी कमाई मै बदनाम
सौ कमरों में गुप्त
खजाने
भोले भले नेता जी
'दो' से 'चार' अगर
मेरा हे!
जनता को मै लूटा जी
यारों आओ अब जागें
हम
सच ईमाँ को चुन लाएं
जाति धर्म को दूर रखें
हम
कर 'विकास' आगे आयें
अपना भारत स्वर्ग अभी
भी
फूट-फूट कर हम रोते
आओ मिल सब हाथ मिला
लें
सिर धुन देखो वे रोते
प्रतिनिधि अपने जाएँ सच्चे
दर्द व्यथा जो अपनी
समझें
'फूल' खिला अपनी क्यारी
में
गुल-गुलशन बगिया महके
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल
'भ्रमर ' ५
६.५५-७.२० पूर्वाह्न
जम्मू ३०.३.१४
DE AISA AASHISH MUJHE MAA AANKHON KA TARA BAN JAOON
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